संतो की शिक्षा
संतो की शिक्षा
भारत एक ऐसा देश है जहाँ ऋषि मंडलेश्वरौ को भगवान का दर्जा दिया जाता है उनके उस भजे सो रह गए ,गुरु भजे हुए पर "| इसी कासुख की अपेक्षा की जाती है जो एक व्यक्ति भगवान से चाहता है क्योंकि सभी मनुष्य जानते है कि गुरु का दर्जा भगवान से भी ऊपर होता है कबीर साहेब जी की वाणी है कि " गुरु बड़े गोविंद से, मन मे देख विचार ,हरि भजे वो राह गए गुरु भजे हो पार", इसलिए गुरु को सर्व श्रेष्ठ माना जाता है मनुष्य जन्म में की मनुष्य को गुरु धारण करना आवश्यक ही है क्योंकि गुरु के बिना मोक्ष सम्भव नही है परन्तु आज जीव के सामने एक विकट समस्या यह है कि संसार मे लाखो गुरु है परन्तु सत साधना और सच्चा गुरु को है आईये जानते है कि हमारे सद्ग्रन्थों के अनुसार पूर्ण गुरु की क्या पहचान होती है
संत की परिभाषा :- सच्चे संत की यह पहचान होती है जो अपने विचारों और ज्ञान से मानव को एक स्वच्छ जीवन व विकार रहित जीवन जीना सिखाये ओर मोक्ष का मार्ग बताये |
सच्चे संत की पहचान कैसे की जाए आइये जाने
गीता के अनुसार :- गीता अध्याय न. 15 श्लोक न.1-4 में बताया है सच्चा संत वह तत्व दर्शी संत होता हैं जो उल्टे लटके हुए संसार रूपी वृक्ष को सभी तत्वों के अनुसार सही सही बताये
वेदों के अनुसार पूर्ण परमात्मा स्वयं तत्वदर्शी संत की भूमिका निभाते है और सत भक्ति का संदेश देते है
कुरान के अनुसार मोहम्मद साहेब को उनका अल्लाह कह रहे है कि उस पूर्ण परमात्मा की खोज के लिए उस बाख़बर से जाकर पूछो|
संतों का जीवन में आना :-
जब तक मनुष्य गुरु धारण नही करता है तब तक वह अपने द्वारा किये हुए पुण्य कर्मों को ही नष्ट करता रहता है और जो उसके जीवन मे दुख आते है वह भी उसे भोगने पड़ते है और उन दुखो से परेशान होकर वह व्यक्ति शराब तम्बाकू गुटखा मास आदि चीज़ो का सेवन करने लग जाता है परंतु जब वह पूर्ण संत की खोज करके उनकी शरण ग्रहण कर लेता है तो वह संत उस व्यक्ति के सभी विकारो को नष्ट करके एक सभ्य जीवन जीने की राह देखता है तथा सत साधना करवा कर पूर्ण मोक्ष की सत भक्ति बताता है
संतों की शिक्षा :-
आज प्रत्येक मनुष्य यह जनता है कि मानव जीवन बहुत ही मुश्किल से प्राप्त होता है इसलिए यह मनुष्य शरीर प्राप्त होने के बाद यहाँ इस काल के लोक में अपने मूल उद्देश्य को भूल कर मोज़ मस्ती करने में अपना मनुष्य जन्म व्यर्थ कर देता है जबकि मनुष्य जन्म का मूल उद्देश्य परमात्मा की सत भक्ति करना और पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति करना होता है लेकिन आज मनुष्य भगवान से कोसों दूर चला गया है इस लोक की चका चोन्द में वह अपने वास्तविक कर्तव्य को भूल चुका है
ओर इस बात की जानकारी गुरु की शरण मे जाने से ही हमे प्राप्त होती है कि हमे परमात्मा नही भूलना चाहिए यह मनुष्य जन्म परमात्मा की भक्ति के लिए प्राप्त हुआ है
"आज भाई को फुरसत है"
एक भक्त सत्संग में जाने लगा| उसने गुरु धारण कर लिया और उनसे दीक्षा प्राप्त कर ली ज्ञान सुना और भक्ति करने लग गया| वह भक्त मित्र से कहता कि सत्संग में चलो परमात्मा की भक्ति कर लो यह मनुष्य जन्म परमात्मा की भक्ति के लिए मिला है यह उनसे बहुत प्रार्थना करता था | परन्तु दोस्त उसकी बात को अनसुना कर देता था| कह देता था कि अभी मुझे कार्य से फुर्सत( खाली समय) नही है छोटे - छीटे बच्चे है इनका पालन- पोषण करना है यदि काम छोड़ कर सत्संग में जाऊंगा तो सारा काम चौपट हो जाएगा |
वह सत्संग में जाने वाला भक्त जब भी सत्संग में जाता तो वह अपने दोस्त से सत्संग में चलने के लिए कहता परन्तु हर बार वह दोस्त फुर्सत नही है यह बहाना बना देता था| एक वर्ष बाद उस मित्र की मृत्यु हो गयी उसकी अर्थी उठाकर कुल के लोग तथा नगरवासी चल रहे थे सभी अर्थी को उठाकर कह रहे थे कि " राम नाम सत है , सत बोलो गत है"
भक्त कह रहा था कि "राम नाम सत है, आज भाई को फुरसत है", सभी नगर वासी यह सुकर कहने लगे कि आप यह क्या बोल रहे हो ऐसा मत बोलो इनके घर वाले बुरा मानेंगे| तब भक्त ने कहा कि मै तो ऐसा ही बोलूंगा | जब में इस मूर्ख से कहता था कि भाई सत्संग में चल कुछ भक्ति कर ले तब यह कहता था कि अभी फुरसत नही है आज इनको परमानेंट फुरसत है | छोटे -छोटे बच्चे भी छोड़ चला जिनका बहाना लेकर के यह परमात्मा की भक्ति से दूर रहा | यदि भक्ति करता तो आज खाली हाथ नही जाता कुछ भक्ति धन साथ लेकर जाता| बच्चो का पालन पोषण तो परमात्मा करते है | भक्ति करने वाले साधक की आयु भी परमात्मा बढ़ा देते है
इन सभी बातों पर गहरी जानकारी हमे संतो के सत्संग से प्राप्त होती है कि हमे मनुष्य जन्म रहते ही परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए
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संत की परिभाषा :- सच्चे संत की यह पहचान होती है जो अपने विचारों और ज्ञान से मानव को एक स्वच्छ जीवन व विकार रहित जीवन जीना सिखाये ओर मोक्ष का मार्ग बताये |
सच्चे संत की पहचान कैसे की जाए आइये जाने
गीता के अनुसार :- गीता अध्याय न. 15 श्लोक न.1-4 में बताया है सच्चा संत वह तत्व दर्शी संत होता हैं जो उल्टे लटके हुए संसार रूपी वृक्ष को सभी तत्वों के अनुसार सही सही बताये
वेदों के अनुसार पूर्ण परमात्मा स्वयं तत्वदर्शी संत की भूमिका निभाते है और सत भक्ति का संदेश देते है
कुरान के अनुसार मोहम्मद साहेब को उनका अल्लाह कह रहे है कि उस पूर्ण परमात्मा की खोज के लिए उस बाख़बर से जाकर पूछो|
संतों का जीवन में आना :-
जब तक मनुष्य गुरु धारण नही करता है तब तक वह अपने द्वारा किये हुए पुण्य कर्मों को ही नष्ट करता रहता है और जो उसके जीवन मे दुख आते है वह भी उसे भोगने पड़ते है और उन दुखो से परेशान होकर वह व्यक्ति शराब तम्बाकू गुटखा मास आदि चीज़ो का सेवन करने लग जाता है परंतु जब वह पूर्ण संत की खोज करके उनकी शरण ग्रहण कर लेता है तो वह संत उस व्यक्ति के सभी विकारो को नष्ट करके एक सभ्य जीवन जीने की राह देखता है तथा सत साधना करवा कर पूर्ण मोक्ष की सत भक्ति बताता है
संतों की शिक्षा :-
आज प्रत्येक मनुष्य यह जनता है कि मानव जीवन बहुत ही मुश्किल से प्राप्त होता है इसलिए यह मनुष्य शरीर प्राप्त होने के बाद यहाँ इस काल के लोक में अपने मूल उद्देश्य को भूल कर मोज़ मस्ती करने में अपना मनुष्य जन्म व्यर्थ कर देता है जबकि मनुष्य जन्म का मूल उद्देश्य परमात्मा की सत भक्ति करना और पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति करना होता है लेकिन आज मनुष्य भगवान से कोसों दूर चला गया है इस लोक की चका चोन्द में वह अपने वास्तविक कर्तव्य को भूल चुका है
ओर इस बात की जानकारी गुरु की शरण मे जाने से ही हमे प्राप्त होती है कि हमे परमात्मा नही भूलना चाहिए यह मनुष्य जन्म परमात्मा की भक्ति के लिए प्राप्त हुआ है
"आज भाई को फुरसत है"
एक भक्त सत्संग में जाने लगा| उसने गुरु धारण कर लिया और उनसे दीक्षा प्राप्त कर ली ज्ञान सुना और भक्ति करने लग गया| वह भक्त मित्र से कहता कि सत्संग में चलो परमात्मा की भक्ति कर लो यह मनुष्य जन्म परमात्मा की भक्ति के लिए मिला है यह उनसे बहुत प्रार्थना करता था | परन्तु दोस्त उसकी बात को अनसुना कर देता था| कह देता था कि अभी मुझे कार्य से फुर्सत( खाली समय) नही है छोटे - छीटे बच्चे है इनका पालन- पोषण करना है यदि काम छोड़ कर सत्संग में जाऊंगा तो सारा काम चौपट हो जाएगा |
वह सत्संग में जाने वाला भक्त जब भी सत्संग में जाता तो वह अपने दोस्त से सत्संग में चलने के लिए कहता परन्तु हर बार वह दोस्त फुर्सत नही है यह बहाना बना देता था| एक वर्ष बाद उस मित्र की मृत्यु हो गयी उसकी अर्थी उठाकर कुल के लोग तथा नगरवासी चल रहे थे सभी अर्थी को उठाकर कह रहे थे कि " राम नाम सत है , सत बोलो गत है"
भक्त कह रहा था कि "राम नाम सत है, आज भाई को फुरसत है", सभी नगर वासी यह सुकर कहने लगे कि आप यह क्या बोल रहे हो ऐसा मत बोलो इनके घर वाले बुरा मानेंगे| तब भक्त ने कहा कि मै तो ऐसा ही बोलूंगा | जब में इस मूर्ख से कहता था कि भाई सत्संग में चल कुछ भक्ति कर ले तब यह कहता था कि अभी फुरसत नही है आज इनको परमानेंट फुरसत है | छोटे -छोटे बच्चे भी छोड़ चला जिनका बहाना लेकर के यह परमात्मा की भक्ति से दूर रहा | यदि भक्ति करता तो आज खाली हाथ नही जाता कुछ भक्ति धन साथ लेकर जाता| बच्चो का पालन पोषण तो परमात्मा करते है | भक्ति करने वाले साधक की आयु भी परमात्मा बढ़ा देते है
इन सभी बातों पर गहरी जानकारी हमे संतो के सत्संग से प्राप्त होती है कि हमे मनुष्य जन्म रहते ही परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए
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अधिक जानकारी के लिए पढिये निःशुल्क पुस्तक ज्ञान गंगा, जीने की राह, लेने के लिए अपना पुरा पता कमेंट करे जी
- !धन्यवाद!


Bhut hi badhiya
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